Sunday, 16 September 2018

मनचली हवा का साथ नहीं दिया 206 √


मनचली हवा का साथ नहीं दिया
तो फेंक दिया मुझे
किसी अनजाने राह पर
खाने के बीच दाँतों में आये
कंकड़ की तरह,
वे लहरें जो तट पर
बार-बार पटकती थी माथा
अकेला पाकर मुझे
डाल दिया भंवर में
जलती आग में
काठ के टुकड़े की तरह।

पता नहीं क्यों
लगता है जैसे बह रही हो
शत्रुता के कण
कण-कण में
किसी बंद तूफाँ को
बाहर धकेलते हुए।

उड़ती पतंग तो नहीं देख पाती
जमीन पर गिरने से
इन्कार करती अपने साये को
पर वृक्ष के साये की लालच में
फंस जाती है
टहनियों में
भ्रष्ट तपस्विनी सी।

इसलिए,
मैं घास के साये से भी
डरने लगा हूँ,
क्या पता वट के साथ मिलकर
ले ले मुझे अपने घेरे में
मेरी किसी दुर्बलता को
वेवक्त  अपना शिकार बना
यह नाइन्साफी है
पर समझता हूँ
सौ साये को मारने के लिए
एक मोमबाती काफी है।

सीप में मोती बनने की खुशी
माँ के गर्भ में बढ़ते
शिशु सी है,
फिर भी
निगल जाय उसे कोई भक्षक
यह सोच चिन्तित हूँ
इसलिए उसकी मनोरम अवस्था की
कल्पना को
आत्मसात् करने से
वंचित हूँ
सूरज के
अत्याचार के फलस्वरुप
बर्फ  से नंगे परबत पर
श्वेतवर्ण के सूखेपन सा।

फिर भी मैं,
थाली में रखे जल में
चाँद डूबोने की
आश लिए बैठा हूँ
मैं भी उसी जल में
झांक लूगाँ अन्दर,
और उसे छू भर लूगाँ
एक छोटा सा समंदर।

मुन्ना। 8709404063
16/9/2018

No comments:

Post a Comment