किसी करतबाज के अंगुली में
संतुलित नाचती तश्तरी सी
नाजुक टिकी है आजादी।
जितने हम उड़ रहे हवा में
उतने छोड़ रहे
काले कारनामों के
दमघोटूँ धुएँ,
खोद रहे हैं
मेहनत से निर्मित
अट्टालिकाओं के तल में
गहरे कुएँ,
अपने ईमान भक्ति श्रद्धा को
विदेशियों और देशशत्रु के हाँथो
गिरवी रख
बना रहे हैं रंगीन शीशे का
स्वप्न-महल,
इससे मन तो सकता है बहल
पर फेंके सत्य के शूल से
हिय बेबस बेकल
जायेंगे दहल।
दलदल में चलाना चाहते हैं
अपनी सोने की नौका,
डूबो देगी आहिस्ता यात्रियों को यह,
न देगी
जीवित बचने का मौका।
बदरों के कलम पकड़ने से
कैसे होगी
नई किताब की जन्म,
आसान नहीं
सत्सूत्रों को समेटे उस महाग्रन्थ
के पृष्ठों का निर्माण
जिसके लेखक में
वेदों की सत्यता
गीता का दर्शन और
रामायण का आदर्श हो।
शायद आधुनिकता की बरसात से
धुंधले पड़ गये हैं
वे सारे अक्षर।
एक अर्से से
वे बचने की कर रहे हैं जंग
मानों छिप रहे हों
बारिश में फुहारों से भयभीत
झाड़ियों में पतंग।
घड़ी की सूइयों को उल्टा चला
हम नहीं ला सकते
गाँधी-युग
विक्षिप्त हिंसा में नहीं पनते
सुभाष
न अनुभूति के अभाव में बिलखते
थोथे भाषणों में
उतर सकते हैं विवेकानन्द।
बेलगाम स्वच्छंदता ने
मन्द कर दिया है
हमारा आत्मिक आनन्द।
हम जमीन दें आजादी को
भूतल में मुक्त बहती जल-धारा
को सम्हालती चट्टान की तरह
या हँसते खिलते फूलों को बसाते
फूलदान की तरह,
तभी हमारी आजादी होगी
चमकते श्रम-बिंदु सी
युक्त सूर्य-तेज
और शिशिर की सुबह उगी
ओस-बिंदु सी
शशि के स्नेहमयी
स्पर्श-सुख से लबरेज।
मुन्ना 8709404063
20/8 2018