Thursday, 30 August 2018

मकां की बुनियाद में 196√

मकां  की  बुनियाद  में  हम  एक  पत्थर डालेगें,
जहाँ  के  बाशिंदों  से  कुछ  रिश्ते तो  बना  लेगें।

रोक तू  दीवानापन  कुदरत  पर न तू नजर लगा,
अश्क के उसके दो  नुक्ते सैलाब जमीं पे ला देगें।

बसी  हुई  इक  तूफाँ  है   तूफाँ   के  जर्रे-जर्रे  में,
जोर   लगायें  ये   यदि   चट्टानों   को   उड़ा  देगें।

ऊँचे ताड़ के पत्ते भी झड़के देते औरों को जगह,
वक्त   ही  सबके  हाँथों  में  नई  मेंहंदी  रचा देगें।

किश्ती और लहरों के बीच  छिड़ गई है जंग नई,
बागियों पे चढ़के आज उनकी औकात बता देगें।

मुन्ना। 8799494063
31/8/2018








Wednesday, 15 August 2018

किसी करतबबाज के अंगुली में 189 √.

किसी करतबाज के अंगुली में
संतुलित नाचती तश्तरी सी
नाजुक टिकी है आजादी।

जितने हम उड़ रहे हवा में
उतने छोड़ रहे
काले कारनामों के
दमघोटूँ धुएँ,
खोद रहे हैं
मेहनत से निर्मित
अट्टालिकाओं के तल में
गहरे कुएँ,
अपने ईमान भक्ति श्रद्धा को
विदेशियों और देशशत्रु के हाँथो
गिरवी रख
बना रहे हैं रंगीन शीशे का
स्वप्न-महल,
इससे मन तो सकता है बहल
पर फेंके सत्य के शूल से
हिय बेबस बेकल
जायेंगे दहल।

दलदल में चलाना चाहते हैं
अपनी सोने की नौका,
डूबो देगी आहिस्ता यात्रियों को यह,
न देगी
जीवित बचने का मौका।

बदरों के कलम पकड़ने से
कैसे होगी
नई किताब की जन्म,
आसान नहीं
सत्सूत्रों को समेटे उस महाग्रन्थ
के पृष्ठों का निर्माण
जिसके लेखक में
वेदों की सत्यता
गीता का दर्शन और
रामायण का आदर्श हो।

शायद आधुनिकता की बरसात से
धुंधले पड़ गये हैं
वे सारे अक्षर।
एक अर्से से
वे बचने की कर रहे हैं जंग
मानों छिप रहे हों
बारिश में फुहारों से भयभीत
झाड़ियों में पतंग।

घड़ी की सूइयों को उल्टा चला
हम नहीं ला सकते
गाँधी-युग
विक्षिप्त हिंसा में नहीं पनते
सुभाष
न अनुभूति के अभाव में बिलखते
थोथे भाषणों में
उतर सकते हैं विवेकानन्द।
बेलगाम स्वच्छंदता ने
मन्द कर दिया है
हमारा आत्मिक आनन्द।

हम जमीन दें आजादी को
भूतल में मुक्त बहती जल-धारा
को सम्हालती चट्टान की तरह
या हँसते खिलते फूलों को बसाते
फूलदान की तरह,

तभी हमारी आजादी  होगी
चमकते श्रम-बिंदु सी
युक्त सूर्य-तेज
और शिशिर की सुबह उगी
ओस-बिंदु सी
शशि के स्नेहमयी
स्पर्श-सुख से लबरेज।

मुन्ना  8709404063
20/8 2018

Monday, 13 August 2018

मैं चिराग हूँ जलूगाँ 182√ः

मैं  चिराग  हूँ  जलूगाँ   सूरज  के  रूबरू,
चाँदनी  में पली शबनम  की जान नहीं हूँ।

ऐ  गुलाब  तू  बजा  रहा  इश्क का  डंका,
मैं  जमीं  का जर्रा  कोई  पहचान नहीं हूँ।

बसर की मैंने जिन्दगी अपनी ही शर्तों पर,
जलते  दीये  की  लौ  का  ईमान  नहीं  हूँ।

मैं  खुशी का टुकड़ा  बस देता थोड़ा सुकूँ,
मौशिकी के लहरों  का कोई  तान नहीं हूँ।

इश्क   मेरी  जान  है   इश्क  ही  जुस्तजु,
बादलों  का  कैदी   हूँ  परेशान   नहीं  हूँ।

पत्थर  मिहनतों  का  मैं ढोता  रहा  सदा,
मजदूर  पसीने  का  हूँ  सुल्तान  नहीं  हूँ।

मुन्ना  8709404063
14/8/2018

Sunday, 12 August 2018

छिपा रखे थे अश्कों को 178 √

छिपा रखे थे अश्कों  को दिल में जतन से,
बेवफा  ये  जहाँ  के   बहाने   निकल पड़े।

अंदर  की   जमीं   थी   फाहे   सी   नरम,
वे  दर्द-ओ-चुभन  दे सताने  निकल  पड़े।

इक  दरिया  दे   रही  थी आवाज  सामने,
वे शबनम के कतरों से नहाने निकल पड़े।

रोके   ताउम्र   उसने   जाना    सोजे-दिल,
वे  खुशी  से जहाँ को  हँसाने निकल पड़े।

कौन    कमबख्त   यहाँ    होश   में   रहा,
बेखुदी के  लिए हम  मैखाने  निकल पड़े।

मुन्ना  8709404063
12/8/2018