Sunday, 12 August 2018

छिपा रखे थे अश्कों को 178 √

छिपा रखे थे अश्कों  को दिल में जतन से,
बेवफा  ये  जहाँ  के   बहाने   निकल पड़े।

अंदर  की   जमीं   थी   फाहे   सी   नरम,
वे  दर्द-ओ-चुभन  दे सताने  निकल  पड़े।

इक  दरिया  दे   रही  थी आवाज  सामने,
वे शबनम के कतरों से नहाने निकल पड़े।

रोके   ताउम्र   उसने   जाना    सोजे-दिल,
वे  खुशी  से जहाँ को  हँसाने निकल पड़े।

कौन    कमबख्त   यहाँ    होश   में   रहा,
बेखुदी के  लिए हम  मैखाने  निकल पड़े।

मुन्ना  8709404063
12/8/2018

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