छिपा रखे थे अश्कों को दिल में जतन से,
बेवफा ये जहाँ के बहाने निकल पड़े।
अंदर की जमीं थी फाहे सी नरम,
वे दर्द-ओ-चुभन दे सताने निकल पड़े।
इक दरिया दे रही थी आवाज सामने,
वे शबनम के कतरों से नहाने निकल पड़े।
रोके ताउम्र उसने जाना सोजे-दिल,
वे खुशी से जहाँ को हँसाने निकल पड़े।
कौन कमबख्त यहाँ होश में रहा,
बेखुदी के लिए हम मैखाने निकल पड़े।
मुन्ना 8709404063
12/8/2018
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