मकां की बुनियाद में हम एक पत्थर डालेगें,
जहाँ के बाशिंदों से कुछ रिश्ते तो बना लेगें।
रोक तू दीवानापन कुदरत पर न तू नजर लगा,
अश्क के उसके दो नुक्ते सैलाब जमीं पे ला देगें।
बसी हुई इक तूफाँ है तूफाँ के जर्रे-जर्रे में,
जोर लगायें ये यदि चट्टानों को उड़ा देगें।
ऊँचे ताड़ के पत्ते भी झड़के देते औरों को जगह,
वक्त ही सबके हाँथों में नई मेंहंदी रचा देगें।
किश्ती और लहरों के बीच छिड़ गई है जंग नई,
बागियों पे चढ़के आज उनकी औकात बता देगें।
मुन्ना। 8799494063
31/8/2018
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