ताक रही है तुम्हें दुनियाँ
एक किश्त तो करजा का दो।
जहर उगलने के बदले,
मिठास तो लहजा का दो।
हमारी दुनियाँ में उग आये
गुनाहों के कितने तारे,
वक्त की मखमली जमीं पे
एक पैबंद भी सजा का दो।
ऐसे न कर सकते खारिज
तुम पैगामे-वफा हमारा,
पलकों के गुफ्तगू से भी
इशारा दिली रजा का दो।
फोड़ डालती गुब्बारे जब
सर चढ़ती खुशियों की हवा,
बहारों के नगमों में भी
अंदाज तुम कजा का दो।
रग-रग तेरा है बोल रहा
कुर्बानी-गाथा माटी की,
जिंदगी के हर कतरे से
कतरा रूह-अफ्जा का दो।
मुन्ना 8709404063
8/9/2018
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