Saturday, 8 September 2018

देख लिए हैं हमने तारे 202 √


देख   लिए    हैं    हमने    तारे   
चलकर      शत-शत     योजन,
धरा  पर  कितने  युद्धिष्ठिर   हैं
नभ    में     कितने    दुर्योधन।

राजता    नग-शृंग    यहाँ    पर
हो  ज्यों    ऊर्ध्व   अंगुल-आश,
अवतार   पुनः  जगतारण  हेतु
धरा   कृष्ण  ने   धर्म-आकाश।

ध्वस्त   यज्ञ   के   अवशेषों  में
परवाह   किसे   है   रीति   की,
सर्पों  के कर्षक  शल्कों  में  ही
ढूंढ   रहे   कण    प्रीति    की।

कौशल से  शंख-व्यूह  को  भेद
निकलती फूंक, कर   जय-नाद,
आता ज्यों   नवांकुर   सृष्टि  में
भंग   पट    लेने   जीवन-स्वाद।

किस रथ को  हैं  हम  हांक रहे
हँस  रहे जल-थल-नभ-दलदल,
डूब रहा दिनमान  क्षितिज  का
हो   रहा  घनतर  तम  पल-पल।

रख  दिए  हैं  हमने  चौराहे पर
घर  पर जला, कुछ  और  दीये,
न    मृत    हों    पवन-छल   से 
शिखायें   बिन  जी  भर  जीये।

मुन्ना। 8709404063
8/9/2018

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