देख लिए हैं हमने तारे
चलकर शत-शत योजन,
धरा पर कितने युद्धिष्ठिर हैं
नभ में कितने दुर्योधन।
राजता नग-शृंग यहाँ पर
हो ज्यों ऊर्ध्व अंगुल-आश,
अवतार पुनः जगतारण हेतु
धरा कृष्ण ने धर्म-आकाश।
ध्वस्त यज्ञ के अवशेषों में
परवाह किसे है रीति की,
सर्पों के कर्षक शल्कों में ही
ढूंढ रहे कण प्रीति की।
कौशल से शंख-व्यूह को भेद
निकलती फूंक, कर जय-नाद,
आता ज्यों नवांकुर सृष्टि में
भंग पट लेने जीवन-स्वाद।
किस रथ को हैं हम हांक रहे
हँस रहे जल-थल-नभ-दलदल,
डूब रहा दिनमान क्षितिज का
हो रहा घनतर तम पल-पल।
रख दिए हैं हमने चौराहे पर
घर पर जला, कुछ और दीये,
न मृत हों पवन-छल से
शिखायें बिन जी भर जीये।
मुन्ना। 8709404063
8/9/2018
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